Article Title |
जनजातीय समाज में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता: प्रमुख चुनौतियाँ |
Author(s) | Farheen Bano, Prof. Pappi Misra. |
Country | India |
Abstract |
सारांश जनजातीय समाज में महिला सशक्तिकरण एक महत्वपूर्ण और जटिल विषय है, जो सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक पहलुओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह शोधपत्र जनजातीय समाज में महिलाओं की स्थिति का विश्लेषण करता है, साथ ही सशक्तिकरण की आवश्यकता और उससे जुड़ी प्रमुख चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है। ऐतिहासिक रूप से, जनजातीय समुदायों में महिलाओं की भूमिका पारंपरिक और समूह और कौशल विकास कार्यक्रम, महिलाओं के लिए कुछ अवसर प्रदान करते हैं, लेकिन इनके प्रभाव में अभी भी सुधार की आवश्यकता है। शोध से यह स्पष्ट होता है कि जनजातीय महिलाओं के सामुदायिक रही है, लेकिन आधुनिक समय में उनके अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य, और आजीविका में कई समस्याएँ बनी हुई हैं। अध्ययन में यह पाया गया है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुँच, आर्थिक संसाधनों की कमी, और सांस्कृतिक बंधनों के कारण जनजातीय महिलाएँ अपनी पूर्ण क्षमता को नहीं प्राप्त कर पाती हैं। इसके अलावा, सामाजिक मान्यताएँ और रीति-रिवाज भी महिला सशक्तिकरण में बाधा डालते हैं, जिससे उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से वंचित रखा जाता है। सरकार द्वारा चलाई जा रही कई योजनाएँ और कार्यक्रम, जैसे कि स्वयं सहायता सशक्तिकरण के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्वतंत्रता, और कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। इसके लिए नीतिगत सुधारों के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना भी अनिवार्य है। निष्कर्षस्वरूप, यह शोध महिला सशक्तिकरण के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की सिफारिश करता है, जिसमें न केवल सरकार, बल्कि गैर-सरकारी संगठन और जनजातीय समुदाय के भीतर से भी प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकें और वे समाज में समान भागीदारी कर सकें। मुख्य बिंदु - महिला सशक्तिकरण, जनजातीय महिलाएं, सामाजिक - आर्थिक स्थिति, लैंगिक असमानता, शिक्षा, बुनियादी अधिकार। |
Area | Political Science |
Issue | Volume 2, Issue 3, March 2025 |
Published | 29-03-2025 |
How to Cite | Bano, F., & Misra, P. (2025). जनजातीय समाज में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता: प्रमुख चुनौतियाँ. ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities, 2(3), 60-67. |